मैदानों के उत्तर में भारत दुनिया के सबसे ऊँचे बसे हुए इलाकों में बदल जाता है। भारतीय हिमालय कोई एक मंज़िल नहीं है - यह कई दुनियाओं का संगम है: लद्दाख के ऊँचे रेगिस्तान, हिमाचल की हरी घाटियाँ, धर्मशाला की तिब्बती बस्ती और गंगा किनारे ऋषिकेश के आश्रम। हर जगह का अपना मौसम, अपनी संस्कृति और अपनी रफ्तार है।
लेह-लद्दाख: छोटा तिब्बत
लद्दाख को अक्सर छोटा तिब्बत कहा जाता है - नंगे पहाड़, फिरोज़ी नदियाँ और सफेद बौद्ध मठ। राजधानी लेह लगभग 3500 मीटर की ऊँचाई पर है, इसलिए सबसे ज़रूरी नियम याद रखें: पहले दो दिन आराम और अभ्यस्त होने के लिए रखें। खूब पानी पिएँ, शराब से बचें - ऊँचाई की बीमारी यहाँ सबसे बड़ी परेशानी है।
शरीर के ढल जाने के बाद असली सफर शुरू होता है। पहाड़ी पर सीढ़ियों की तरह बना थिकसे मठ और लद्दाख का सबसे समृद्ध हेमिस मठ सुबह की प्रार्थना के समय देखने लायक हैं। लगभग 4250 मीटर पर स्थित पैंगोंग त्सो झील अपने बदलते नीले रंगों के लिए मशहूर है - यहाँ जाने के लिए परमिट चाहिए। रेत के टीलों और दो कूबड़ वाले ऊँटों की नुब्रा घाटी तक खारदुंग ला दर्रे से पहुँचा जाता है, जिसकी तख्ती पर ऊँचाई करीब 5359 मीटर लिखी है - यह दुनिया की सबसे ऊँची वाहन-योग्य सड़कों में गिनी जाती है। सड़क से यात्रा का मौसम जून से सितंबर है; सर्दियों में रास्ते बंद हो जाते हैं और सिर्फ हवाई जहाज़ से लेह पहुँचा जा सकता है।
मनाली और लेह की सड़क
मनाली ऊँचे पहाड़ों का द्वार है। पुरानी मनाली के कैफे और सेब के बाग बैकपैकर माहौल के लिए मशहूर हैं, सोलंग घाटी में पैराग्लाइडिंग और सर्दियों में स्कीइंग होती है, और अटल टनल से लाहौल घाटी अब मिनटों में पहुँच जाती है। मनाली-लेह मार्ग दो दिन का रोमांचक सफर है, जो 5000 मीटर से ऊँचे दर्रों से गुज़रता है - अनुभवी ड्राइवर के साथ ही चलें।
धर्मशाला और मैक्लॉडगंज
धर्मशाला के ऊपर बसा मैक्लॉडगंज 1960 से दलाई लामा और निर्वासित तिब्बती समुदाय का घर है। त्सुगलगखांग मंदिर की कोरा परिक्रमा, घूमते प्रार्थना चक्र और गरम मोमो यहाँ के अनुभव का हिस्सा हैं। एक दिन की त्रिउंड ट्रेक से धौलाधार की बर्फीली दीवार का शानदार नज़ारा मिलता है।
ऋषिकेश: गंगा किनारे योग
जहाँ गंगा पहाड़ों से मैदान में उतरती है, वहाँ ऋषिकेश है - योग की विश्व राजधानी। यहाँ के आश्रम एक क्लास से लेकर महीने भर के कोर्स तक कराते हैं; 1968 में बीटल्स ने महर्षि के आश्रम में ध्यान सीखा था, जिसके भित्तिचित्रों से भरे खंडहर आज भी देखे जा सकते हैं। शाम की गंगा आरती, लक्ष्मण झूला और राम झूला पुल, और रिवर राफ्टिंग - आस्था और रोमांच यहाँ साथ चलते हैं।
शिमला और टॉय ट्रेन
अंग्रेज़ों की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला तक पहुँचने का सबसे सुंदर तरीका है कालका-शिमला रेलवे - यूनेस्को धरोहर में शामिल टॉय ट्रेन, जो चीड़ के जंगलों और सौ से ज़्यादा सुरंगों से गुज़रती है।
ज़रूरी बातें
- ऊँचाई पर धीरे-धीरे चढ़ें; सिरदर्द और उल्टी को हल्के में न लें।
- पैंगोंग और नुब्रा के परमिट ऑनलाइन या लेह की एजेंसियों से बनवाएँ।
- गर्मियों में भी परतदार कपड़े रखें - लद्दाख में धूप और बर्फीली हवा एक ही घंटे में बदल सकती है।
- अंदाज़ा: लद्दाख में साझा टैक्सी का दिन 2000-4000 रुपये प्रति व्यक्ति, थाली 150-300 रुपये।